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भारतदृयूके एफटीए 
By Textile Mirror - 01-08-2025

भारतीय टेक्सटाइल निर्यात को मिलेगा वैश्विक विस्तार
ब्रिटेन में शून्य टैरिफ से इंडियन फैब्रिक, गारमेंट्स और हैंडलूम उद्योग को नई उड़ान
नई दिल्ली/ भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच हाल ही में संपन्न हुआ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट भारतीय टेक्सटाइल और परिधान निर्यात क्षेत्र के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है। इस समझौते के तहत दोनों देशों के बीच वस्त्र और परिधान व्यापार पर लगने वाला आयात शुल्क हटाया जाएगा। अनुमान है कि 2026 के अंत तक यह 0 प्रतिशत ड्यूटी व्यवस्था प्रभावी रूप से लागू हो जाएगी। इसका सीधा लाभ भारतीय टेक्सटाइल एक्सपोर्टर्स को मिलेगा, जिससे यूके में भारत के वस्त्रों की प्रतिस्पर्धा क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी।
निर्यातकों के लिए नया युग
भारत के वस्त्र और परिधान उद्योग का यूके के साथ व्यापार पहले से ही मज़बूत है। 2024-25 में भारत का यूके को टेक्सटाइल और गारमेंट निर्यात लगभग 1.4 अरब डॉलर तक रहा। यह भारत के कुल परिधान निर्यात का लगभग 6-7 प्रतिशत है। अब एफटीए के तहत आयात शुल्क समाप्त होने से विशेषज्ञों का मानना है कि यह आंकड़ा 2029 तक 3.5 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि एफटीए लागू होने के साथ ही यूके में स्थित कई खरीददार, ब्रांड्स, रिटेल चेन और ट्रेड पार्टनर्स भारत की ओर रुख करेंगे। इसके पीछे दो प्रमुख कारण हैंकृपहला, भारत में अब यूके से सस्ते में निर्यात किया जा सकेगा और दूसरा, भारतीय टेक्सटाइल अपने फैब्रिक क्वालिटी, डिज़ाइन विविधता और हस्तनिर्मित कौशल के लिए पहले से ही प्रसि( है।
कौन से क्षेत्र होंगे लाभान्वित?
इस एफटीएसे सबसे अधिक लाभ उन क्षेत्रों को होगा जो पहले से ब्रिटेन के बाज़ार में सक्रिय हैं या जिनका मूल्य संवर्धन अधिक है-
-निट वियर तिरुपुर जैसे हब से भारी मात्रा में एक्सपोर्ट की संभावना।
-हैंडलूम और हस्तनिर्मित वस्त्र- खासतौर पर भारतीय डॉयस्पोरा की मांग को देखते हुए।
-वूलेन और मैनमेड फाइबर उत्पाद- ब्रिटेन के मौसम को ध्यान में रखते हुए।
-इंडियन एथनिक वियर- सलवार-सूट, साड़ियां, कुर्ते आदि की लोकप्रियता बढ़ेगी।
सीएमएआई के अनुसार, यूके के बाजार में पारंपरिक भारतीय एथेनिक वियर की भारी मांग है, खासकर भारतीय प्रवासियों और संस्कृति प्रेमियों के बीच।
उद्योग की प्रतिक्रिया
सीएमएआई के अध्यक्ष संतोष कटारिया ने कहा कि यूके से जो गारमेंट्स भारत में आयात होंगे, वे प्रीमियम और लग्ज़री सेगमेंट के होंगे। इससे घरेलू बाजार पर कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ेगा। बल्कि यह प्रतिस्पर्धा गुणवत्ता में सुधार का अवसर बनेगी।
सीएमएआई के चीफ मेंटर राहुल मेहता का मानना है कि ब्रिटेन से ड्यूटी-फ्री गारमेंट्स का आना भारतीय ब्रांड्स को अपने प्रोडक्ट्स की क्वालिटी, सर्विस और ब्रांड पोजिशनिंग सुधारने की प्रेरणा देगा, जिसका लाभ अंततः ग्राहकों को ही मिलेगा।
साउर्दन इण्डिया मिल्स एसोसिएशन के चेयरमैन डॉ. एस.के. सुन्दरारामन ने इसे भारत के टेक्सटाइल निर्यात के लिए एक ‘गेम-चेंजर’ करार देते हुए कहा कि अब हमारे निर्यातकों को प्रतिस्पर्धी देशों जैसे बांग्लादेश, तुर्की, वियतनाम आदि के मुकाबले बेहतर स्थिति मिलेगी।
चुनौतियां भी होंगी सामने
हालांकि यह समझौता एक बड़ा अवसर है, लेकिन इसके साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हैं-
क्वालिटी अपग्रेडेशन- ब्रिटिश बाजार की मांग को देखते हुए क्वालिटी कंट्रोल और टेस्टिंग इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करना होगा।
ब्रांडिंग और पैकेजिंग- भारतीय ब्रांड्स को अपने प्रोडक्ट्स को इंटरनेशनल लेवल पर प्रस्तुत करने के लिए नई रणनीति बनानी होगी।
लॉजिस्टिक्स सपोर्ट- तेजी से डिलीवरी और रिटर्न मैनेजमेंट के लिए लॉजिस्टिक्स और कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार ज़रूरी होगा।
मानव संसाधन प्रशिक्षण- नई मांगों के अनुरूप कारीगरों और कर्मचारियों को प्रशिक्षित करना आवश्यक होगा।
सरकार से अपेक्षाएं
उद्योग जगत अब भारत सरकार से इस दिशा में और सक्रिय कदमों की अपेक्षा कर रहा है। जैसेकि-
-एमएसएमई निर्यातकों को वित्तीय सहायता।
-निर्यात प्रोसेस को आसान बनाना।
-तकनीकी अपग्रेडेशन के लिए सब्सिडी योजनाएं।
-विदेशी खरीदारों से बी2बी प्लेटफॉर्म का सृजन।
भारतदृयूके एफटीए से भारत का टेक्सटाइल उद्योग वैश्विक प्रतिस्पर्धा के एक नए युग में प्रवेश कर रहा है। यह न सिर्फ निर्यात को बल देगा, बल्कि भारतीय ब्रांड्स को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने का मंच भी बनेगा। यदि सरकार, उद्योग और निर्यातक मिलकर इस अवसर का उपयोग करें, तो यह भारत को ‘ग्लोबल टेक्सटाइल हब’ बनाने की दिशा में एक अहम क़दम होगा।

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