
It is recommended that you update your browser to the latest browser to view this page.
Please update to continue or install another browser.
Update Google ChromeYarn Rates
विकास के नाम पर विनाश की खुली कहानी
अरावली की पहाड़ियाँ आज किसी प्राकृतिक संकट से नहीं, बल्कि मानव लालच, प्रशासनिक ढिलाई और राजनीतिक चुप्पी से जूझ रही हैं। देश की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में शामिल अरावली सिर्फ पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि उत्तर भारत का पर्यावरणीय सुरक्षा कवच है। बावजूद इसके, आज यह पहाड़ी श्रृंखला अवैध खनन, अंधाधुंध निर्माण और तथाकथित ‘विकास परियोजनाओं’ की भेंट चढ़ाई जा रही है।
ताजा मुद्दा यह है कि अरावली क्षेत्र में खनन गतिविधियाँ खुलेआम जारी हैं, चाहे वह हरियाणा हो, राजस्थान हो या दिल्ली-एनसीआर का इलाका। नियमों के मुताबिक अरावली में खनन प्रतिबंधित है, फिर भी ज़मीन के नीचे से पत्थर निकाले जा रहे हैं और ऊपर से कागज़ों में सब कुछ ‘कानूनी’ दिखाया जा रहा है। सवाल साफ हैकृअगर कानून मौजूद है, तो उसका पालन क्यों नहीं?
सरकारें अक्सर दलील देती हैं कि ‘विकास जरूरी है।’ लेकिन यह कौन सा विकास है, जो जल स्रोत सुखा देता है, जंगल खत्म कर देता है और तापमान बढ़ा देता है? अरावली की पहाड़ियाँ भूजल रिचार्ज का बड़ा स्रोत हैं। इनके नष्ट होने का सीधा असर दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान के जल संकट पर पड़ रहा है। फिर भी जिम्मेदार लोग आंख मूंदे बैठे हैं।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया मजाक बनती जा रही है। रिपोर्टें बनती हैं, आपत्तियां दर्ज होती हैं और फिर वही परियोजनाएं पास कर दी जाती हैं। जिन एजेंसियों को अरावली की रक्षा करनी चाहिए, वही या तो मौन हैं या मजबूर। कहीं न कहीं यह साफ संकेत है कि सिस्टम में इच्छाशक्ति की भारी कमी है।
स्थानीय लोग और पर्यावरण कार्यकर्ता बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि अगर अरावली को नहीं बचाया गया, तो आने वाले वर्षों में रेगिस्तान और प्रदूषण का दायरा कई गुना बढ़ जाएगा। लेकिन इन आवाजों को अक्सर ‘विकास विरोधी’ कहकर खारिज कर दिया जाता है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है कि जो लोग भविष्य की चिंता कर रहे हैं, उन्हें ही बाधा बताया जा रहा है?
खरी-खरी बात यह है कि अरावली का मुद्दा सिर्फ पर्यावरण का नहीं, बल्कि नीति, नीयत और जवाबदेही का है। जब तक दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, जब तक अवैध खनन पर जीरो टॉलरेंस नहीं अपनाई जाएगी, तब तक अरावली सिर्फ फाइलों और भाषणों में ‘संरक्षित’ रहेगी, जमीन पर नहीं।
अब समय आ गया है कि सरकारें विकास और विनाश के फर्क को समझें। अरावली को बचाना कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है। अगर आज भी हम नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियां हमसे यही सवाल करेंगीकृ‘जब अरावली टूट रही थी, तब आप चुप क्यों थे?’