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कपास बुवाई में 3.35 प्रतिशत कमी
मुंबई/ रूई बाजार में हाल के दिनों में ऊँचे भाव स्तर से प्रति खंडी लगभग 1,000 रुपए की गिरावट दर्ज की गई है। हाजिर बाजार में रूई का भाव एक समय 58,000 रुपए प्रति खंडी के स्तर को छू गया था, जो अब घटकर करीब 57,000 रुपए पर आ गया है। वैश्विक स्तर पर भारतीय टेक्सटाइल उद्योग के सामने गंभीर चुनौतियाँ खड़ी हो गई हैं, खासकर अमेरिकी सरकार द्वारा भारतीय एपरल और टेक्सटाइल उत्पादों पर भारी टैरिफ लगाने के बाद। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से भारत के कपड़ा और परिधान निर्यात को बड़ा झटका लग सकता है।
कपास बुवाई में गिरावट
देश में इस बार कपास की कुल बुवाई में 3.35 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है। महाराष्ट्र, जो देश का सबसे बड़ा कपास उत्पादक राज्य है, में वर्ष 2025-26 के दौरान बुवाई का क्षेत्रफल पिछले साल के 50.42 लाख हेक्टेयर से घटकर 38.04 लाख हेक्टेयर रह गया है, यानी 6.12 प्रतिशत की गिरावट। किसानों की मानसिकता में बदलाव देखा जा रहा है और वे स्थिर एवं कम खर्च वाली फसलों की ओर रुख कर रहे हैं। कारण यह है कि कपास में लागत बढ़ने और बाजार में अस्थिरता के चलते प्रति हेक्टेयर उत्पादकता घट रही है, जिससे किसानों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है।
राज्यों में अलग-अलग रुझान
सीजन के आंकड़ों के अनुसार, पंजाब, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में कपास बुवाई का क्षेत्रफल बढ़ा है, जबकि गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान में गिरावट दर्ज की गई है। यदि उत्पादन घटता है, तो इसका सीधा असर देश में रूई के आयात-निर्यात पर पड़ेगाकृआयात बढ़ सकता है और निर्यात घट सकता है।
बाजार पर असर और सीसीआई की भूमिका
वीविंग और कपड़ा उद्योग में ऑर्डर की कमी के कारण निकट भविष्य में रूई में तेज़ी की संभावना कम मानी जा रही है। चीन जैसे बड़े आयातक देश भी इस समय सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। चालू सीजन में भारतीय कपास निगम ने किसानों से न्यूनतम समर्थन मूल्य पर 100 लाख गांठ से अधिक कपास खरीदी थी, जिसमें से अधिकांश स्टॉक बिक चुका है। अनुमान है कि वर्तमान में सीसीआई के पास लगभग 26 लाख गांठ का स्टॉक मौजूद है, जबकि किसानों के पास अब लगभग कोई स्टॉक नहीं बचा है।
मांग और कीमतों का रुझान
हालांकि सरकार ने कपास का एमएसपी बढ़ाया है, लेकिन इसके बावजूद बुवाई में कमी दर्ज हुई है, जो उत्पादन घटने का संकेत है। इस समय सीसीआई द्वारा स्पिनिंग मिलों को पर्याप्त मात्रा में रूई उपलब्ध कराई जा रही है, जिससे यार्न मिलों को सस्ती रूई मिल रही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी रूई के भाव स्थिर से कमजोर बने हुए हैं।
अमेरिकी टैरिफ का खतरा
अमेरिकी टैरिफ के कारण भारत से कपड़ा और परिधान निर्यात प्रभावित हो सकता है, जिसका सीधा असर रूई की मांग पर पड़ने की आशंका है। अगर निर्यात घटा, तो घरेलू बाजार में बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है, जिससे किसानों और व्यापारियों दोनों के लिए स्थिति चुनौतीपूर्ण हो सकती है।