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इंदौर/ बाजारों में ग्राहकी मध्यम रूप से है। रमजान माह शादी विवाह का सीजन होते हुए भी व्यापार पूरी तरह से नहीं चल रहा है। क्षमतावान व्यापारी वर्ग भी स्टॉक करने के पक्ष में नहीं है। मांगनी पर पूर्ति हो जाती है चाहे वीवर्स हो या ट्रेडर्स जो पहले अपनी क्षमता अनुसार स्टॉक करते थे। वह स्थिति वर्तमान में है नहीं इस हिसाब से देखा जाये तो 100 प्रतिशत की जगह 50 प्रतिशत से 60 प्रतिशत पर टिका हुआ है।
ब्लीच माल में जरूर लेवाली है पर पहले से कम है। आशानुरूप व्यापार हो नहीं पाया। रमजान के हिसाब से होलसेल व्यापारी वर्ग अपना स्टॉक किये हुए है। होलसेल व्यापार में अब ग्राहकी कम है यही हाल सेमी होलसेलर का है। रिटेल मार्केट में चहल-पहल हैं और अप्रेल माह तक की जो आशा संजोये हुए है कि व्यापार अच्छा चलेगा।
होली के बाद से अर्थात 20 मार्च के बाद से अप्रेल पूरा व्यापार अच्छा चलना चाहिये। उम्मीद है व्यापारी वर्ग को 60 प्र्रतिशत 70 प्रतिशत तक कमाई करवायेगा।
वर्तमान में मुंबई की शर्टिंग ईरोड़ व इचलकरंजी का ब्लीच माल पोपलीन, लोन व केम्ब्रिक के माल की पूछपरख रही। शर्टिंग में अभी चाइना के आयातित माल की बाजारों में मांगनी अच्छी रही है। मुंबई सूरत के क्षमतावान व्यापारियों का अच्छा खासा दखल है, जो कपड़ा वे बनाते थे। उसकी जगह अब इस माल का थोक व्यापार कर रहे हैं। इस वजह से भारत में निर्मित माल की बिक्री पर अच्छा खासा असर हो रहा है।
गारमेण्ट निर्माता जो यूनिफॉर्म बनाते हैं। वे बहुत व्यस्त है। यूनिफॉर्म बनाने में फेंसी माल में किड्स व लेडीज गारमेण्ट में पूछपरख है। मेन्सवियर में कम है।
जींस व टी-शर्ट का चलन ज्यादा होने से ट्राउजर व शर्ट्स में असर पड़ा है। गारमेण्ट उद्योग में बहुत से व्यापारी एक्सपोर्ट में भी कार्यरत है। अगर हमारे वस्त्र निर्माता बंधु मुनाफे के साथ-साथ गुणवत्ता पर ध्यान देवे तो भारत से बहुत अच्छे एक्सपोर्ट का व्यापार हो सकता है। इसमें कोई दो मत नहीं कि हम फैब्रिक में सिरमोर हो सकते हैं, क्योंकि हमारे पड़ौसी देश, म्यांमार, श्री लंका व अन्य उत्पादक देश अपनी आंतरिक दशा में जूझ रहे हैं।
वस्त्र उद्योग में सरकार की नीतियों में थोड़ा सुधार व सहयोग मिल जावे तो भारत का वस्त्र उद्योग में बहुत तरक्की हो जावे। अब प्रश्न है रूपये की खेंच बाजारों में क्यों है।
1- कृषि का रूपया जो बाजारों में आता था वह अब बैंकों को जा रहा है। किसानों की सरकार ने बैंकांे के द्वारा सुविधा करवा दी है। अतः जो रूपया बाजारों में आता था, वह रूक गया।
2- पहले नगदी व्यवहार होता रहा अब वह 5 प्रतिशत से 10 प्रतिशत रह गया क्योंकि पेटीएम, क्रेडिट कार्ड ने जगह बना ली हैं इस कारण नकद व्यवहार कम हो गया है। कुछ समय लगेगा स्थिति सुधरेगी और फ्लो बढ़ेगा।